साथ जो मिलता उन्हें

चलते रहे बहुत मगर
मंजिल का साथ ना मिला

सुखनसाज़  बहुत बजते रहे
पर करारे-सुकून ना मिला

तख्तों ताज़ पर बैठे रहे वो
पर वादों पर फूलों सा चमन ना मिला

मिलती जो उन्हे इक खुशी चाँद सा
चाँदनी जो छुपती,पर बादलो का साथ ना मिला

पहाड हर तरफ रहे पिघल भी जाते
मगर उगते सूरज का इन्हें साथ ना मिला

जलती रही चिरागें-मोहब्बत बहुत
गुजरते वक्त में उम्र का साथ ना मिला

क्या खो के वे ताकीद कर रहे है
सूना है कि उन्हें अपनों का साथ ना मिला

भींग भी जाते और बरस जाते वो मगर
बादलों को आसमान का साथ ना मिला !!

9 comments:

  1. such kaha sandhya ji....agar jo chahe ushka sath mile to zindagi jine ka andaz hi kuch aur hoga...magar kya kare o bhi sath na mila

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  2. भींग भी जाते और बरस जाते वो मगर
    बादलों को आसमान का साथ ना मिला !!बहुत खूब भाव संजोय है आपने सुंदर रचना

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  3. बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......

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  4. जलती रही चिरागें-मोहब्बत बहुत
    गुजरते वक्त में उम्र का साथ ना मिला waah

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  6. अच्छी प्रस्तुति

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  7. पहाड हर तरफ रहे पिघल भी जाते
    मगर उगते सूरज का इन्हें साथ ना मिला

    सुंदर भाव

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